Haryana Milk Man Sun Wrestler Deepak Punia Biography in हिंदी

दोस्तों सफलता एक ऐसी चीज है जिसको पाना तो हर कोई चाहता है पर इसको पाने के लिए जिस लगन से कड़ी मेहनत करनी पड़ती है वह कोई नहीं करना चाहता | तो आज हम आपको सुनाना चाहते है एक ऐसे पहलवान की रियल लाइफ स्टोरी जिन्होंने दोनों चीज कड़ी मेहनत और लगन से इतिहास रच दिया है | उन्होंने ओलिंपिक जैसे उस खेल में अपना नाम शामिल कराया है जिसमे जाने का हर एक खिलाड़ी सपना देखता है |

उस पहलवान का नाम है दीपक पुनिया दोस्तों दीपक पुनिया पहलवान का जन्म 1999 में हरियाणा के झज्जर जिले में गांव छारा में हुआ | उनका गांव छारा और मांडोठी हरियाणा में ही नहीं पुरे भारत वर्ष में कुश्ती के लिए जाना जाता है जिसने सोनू मांडोठी जैसा भारत केसरी वह हिन्द केसरी पहलवान देश को दिया और बहुत से पहलवान उनके गांव से निकले है जिन्होंने देश विदेश में भारत का नाम रोसन किया पर दीपक पुनिया जितना मुकाम सायद ही किसी ने हासिल किया हो |

दीपक पुनिया बताते है उन्होंने अपनी कुश्ती की सुरुवात उनके बड़े भाई सुनील को देख कर की थी वह भी अपने टाइम के कुछ समय पहले तक बहुत अच्छे पहलवान रहे है वह दंगलों की कुश्तियों में चोटीवाला पहलवान के नाम से मसूर थे | दीपक के परिवार के आर्थिक हालात इतने अच्छे नहीं थे उनके पिता का दूध का व्यवसाय था वह आसपास के गाँवो में दूध बेचने जाया करते थे | जब दीपक पुनिया छोटे थे तो जब उनके पिता पास के आखाड़े में दूध देने जाते थे तो वह भी साथ चले जाया करते थे वहाँ से पहलवानो को देख उनके मन में भी कुश्ती करने का विचार आया | घर के आर्थिक हालत इतने अच्छे नहीं थे की वो उसके कुश्ती के खाने पिने का खर्चा उठा सके पर उसके बावजूद भी उनके घरवालों ने उसको गांव के पास के ही एक अखाड़े में 2008-9 में कुश्ती करने के लिए भर्ती करा दिया जहा उनके कोच थे वीरेंदर दलाल ओर फिर यही से सुरुवात हुई दीपक पुनिया की ओलम्पियन दीपक पुनिया बनने की |

यहाँ उन्हें कुछ वर्षो की कड़ी मेहनत के बाद 2013 में मैट पर उतरने का मौका मिला जहाँ उन्होंने किसी को निराश न करते हुए स्कूल नेशनल में ब्रोंज मैडल हासिल किया | उसके कुछ दिन बाद पहलवान दीपक पुनिया पुराना अखाड़ा छोड़ छतरसाल स्टेडियम दिल्ली चले गए जहाँ सुशील कुमार वह योगेश्वर दत्त जैसे भारत के नामी पहलवान अभ्यास करते थे वहाँ उनके दूसरे गुरु हुए और जो अब तक है वीरेंदर कुमार |

दोस्तों इसके बाद दीपक पुनिया ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा वह एक के बाद एक मैडल देश को लाकर देते रहे और कई वर्षो बाद पहली बार 86 किलोग्राम की केटेगरी में लगने लगा है की कोई पहलवान है जो देश की ओलम्पिक में मैडल की आशा को पूरी कर सकता है |

Deepak Punia Wrestler Medal:-

  • उनकी इस सफलता की सुरुवात होती है सन 2015 से इस वर्ष उन्होंने स्कूल नेशनल में गोल्ड मैडल हासिल किया |
  • 2016 में कैडेट नेशनल में गोल्ड मैडल और उसी वर्ष सब-जूनियर के वर्ल्ड चैंपियन बने और एशियाई खेलो में गोल्ड मैडल देश के नाम कराया |
  • 2017 में जूनियर एसियन गेम्स में सिल्वर मैडल |
  • 2018 में जूनियर एसियन गेम्स में गोल्ड मैडल और उसी वर्ष वर्ल्ड चैंपियनसीप में सिल्वर मैडल हासिल किया |
  • 2019 में सीनियर एसियन गेम्स में ब्रोंज मैडल, जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में गोल्ड मैडल और सीनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में सिल्वर मैडल हासिल कर एक वर्ष में एक ही केटेगरी में देश को तीन तीन मैडल देश के नाम कराए |
  • इस वर्ष 2021 में हाल ही में काजिकिस्तान आयोजित सीनियर एसियन गेम्स में सिल्वर मैडल अपने नाम किया |

दोस्तों उनके जीवन का यह इतना बड़ा सफर इतना आसान तो नहीं रहा होगा यह इतना बड़ा मुकाम उनकी कड़ी मेहनत, उनके माता पिता का आशीर्वाद और एक अच्छे गुरु की शिक्षा का नतीजा है| दोस्तों एक बात आपको बता दू उनके परिवार के आर्थिक हालात चाहे कैसे भी रहे पर उन्होंने कभी दीपक पुनिया को पहलवान बनाने के लिए खाने पिने में कभी कमी नहीं आने दी उनके पिता रोजाना उनका खाना और दूध सुरु से लेकर अब तक घर से ही लेकर जाते है |

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दीपक पुनिया ने भी अपनी मेहनत से कभी किसी को निराश नहीं किया उनका ध्यान हमेसा अपने खेल पर रहता था उनके साथी पहलवान बताते है दीपक पुनिया कभी अपनी प्रैक्टिस और एक्सरसाइज नहीं छोड़ते वह कही बहार भी गए हो तो भी आकर प्रैक्टिस जरूर करते है | दोस्तों यही छोटी छोटी चीजे है जो एक खिलाड़ी को दूसरे खिलाड़ी से अलग बनाती है ओर उसको उन उचाईयो तक लेकर जाती है जिसके बारे में वह दिन रात सोचता है | आज उसकी कड़ी मेहनत के कारण उसके परिवार के आर्थिक हालत भी सुधर गए है कितने गर्व की बात उनके लिए जिसके पिता कुछ वर्षो पहले पुरानी मोटरसाइकल से दूध बेच कर गुजरा करते थे आज उनके पास सब कुछ है अच्छी गाड़ी अच्छा घर और गाँव सहर में बेटे की वजह से नाम और इस से ज्यादा किसी को जीवन में क्या चाहिए |

तो दोस्तों ये थी एक छोटे से गांव के पहलवान की सफलता की कहानी हम आसा करते है इस कहानी से आपको कुछ सिखने को जरूर मिला होगा तो लग जाइये आज और अभी से जिस मुकाम को हासिल करना चाहते है देर भले ही लग जाए पर मिलेगा जरूर क्योकि मेहनत कभी खराब नहीं जाती |

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