Wrestler Ravi Dahiya Biography: Zero to Hero

कुछ दिन पहले हमने आपको दीपक पुनिया के जीवन के सफर के बारे में बताया था तो उस से ही कुछ मुलता झूलता है रवि दहिया पहलवान के जीवन का भी सफर बहुत सी बाते है जो दोनों में मिलती झूलती है दोनों इस मुकाम पर है जहा जाने का हर खिलाडी अपने जीवन में सपना देखता है और जो मेहनत करता है उनका वह सपना पूरा हो जाता है और जो नहीं करता उनका सपना सपना ही रह जाता है

तो चलिए अब बात करते है रवि दहिया के जीवन के सफर की रवि दहिया का जन्म हरियाणा के सोनपत जिले के गांव नारी में हुआ 1997 में हुआ उनको बचपन से ही कुश्ती का बहुत शोक था क्योकि उनके चाचा आर्मी में पहलवान थे उनको देखकर उनके मन में भी कुश्ती खेलने का विचार आया पर घर परिवार के आर्थिक हालत इतने अच्छे नहीं थे की उनको सुरु से ही किसी अकाडेमी में भेज सके पर उनके अंदर तो कुश्ती का जूनून था उन्होंने अपने गांव के ही एक अखाड़े में जाना सुरु कर दिया जहा पहलवान बरह्मचारी हंशराज दहिया तयारी करवाते थे फिर कुछ वर्ष तक वह कुश्ती करते रहे पर जब घरवालों को लगा इसमें कुश्ती का अच्छा जूनून है तो उसको छतरसल स्टेडियम दिल्ली भेज दिया |

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जहा कुश्ती के जानी मानी हस्तिया अभ्यास करती थी और द्रोणचार्य पदमश्री अवार्डी महाबली सतपाल सिंह पहलवान कुश्ती सिखाया करते थे यहाँ आकर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा क्योकि इनको यहाँ वो सब माहौल मिला जो की एक पहलवान को ओलिंपिक मैडल जितने के लिए चाहिए पर सुरु में एक दौर ऐसा भी आया जब रवि दहिया अच्छा नहीं कर रहे थे कुछ वर्षो तक कुश्ती में और उनका सवस्थ भी खराब रहता था उन्होंने कुश्ती छोड़ने का मन बना लिया था पर भगवन ने तो उनके लिए कुछ और ही सोच रखा था और यह पूरा किया उनके कमरे में रहने वाले एक सीनियर पहलवान अरुण पंडित ने वह अरुण पंडित ही थे जिन्होंने रवि को उन ख़राब हालत से लड़ने का हौसला दिया और अपने साथ प्रैक्टिस कराने लगे और धीरे धीरे उनका स्वास्थ्य भी ठीक हो गया और वो कुश्तियों में भी अच्छा करने लग गए और वह दिन है और आजका दिन अरुण पहलवान हमेसा उनके साथ रहते है उनकी एक एक चीज ख्याल रखते है

उसके बाद 2010 के बाद रवि दहिया अनेको बार नेशनल चैंपियन बने और फिर कई वर्ष के कड़े तप के बाद उन्हें 2013 में जूनियर एसियन चैंपियनशिप मंगोलिया में भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला और उन्होंने वहा किसी को निराश नहीं करते हुए सिल्वर मैडल अपने नाम किया उसके बाद उन्हें 2015 में जूनियर एशियाई चैंपियनशिप में फिर से मौका मिला यहाँ भी उन्होंने जबरदस्त खेल दिखाया और गोल्ड मैडल पर कब्ज़ा किया |

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उसके बाद इन्होने 2015 वर्ल्ड चैंपियनशिप जो ब्राजील में होनी थी उसके लिए क्वालीफाई किया और वहाँ भी अच्छा पर्दर्सन कर सिल्वर मैडल अपने नाम किया उसके बाद इनको अंतराष्ट्रीय टूर्नामेंट खेलने में तीन साल का समय लग गया फिर इन्होने 2018 में रोमेनिया में अंडर 23 वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई किया और सिल्वर मैडल देश को दिलाया |

उसके बाद इन्होने 2019 में एसियन चैंपियनशिप में भाग लिया पर यहाँ इनको बड़ा झटका लगा क्योकि ये इस चैंपियनशिप में पाचवे स्थान पर रहे अब तक की इनकी परफॉरमेंस को देखते हुए यह निराशजनक था पर इन्होने हार नहीं मानी और उसी वर्ष वर्ल्ड कप में भाग लिया और वहा इनको ब्रोंज मैडल मिला इनका सेमफिनॉल में मुकाबला अबकी बार जो पहलवान ओलिंपिक में फाइनल में इनके सामने था उनसे हुआ था और इनको उनसे हार का सामना करना पड़ा था |

और इसी वर्ष रवि दहिया ने ओलिंपिक क्वालीफ़ायर में भाग लिया और ब्रोंज मैडल जीतकर ओलिंपिक में क्वालीफाई कर लिया था और उसके बाद से अब तक रवि दहिया जबर्दस्त फॉर्म में चल रहे है |

अब साल था 2020 एशियन चैंपियनशिप अयोजित हुई दिल्ली में यहाँ रवि ने रिकॉर्ड परदर्शन दीखाया उन्होंने सबी मुकबलो में एकतरफा जीत के साथ गोल्ड जीता और इस प्रतियोगिता की खास बात यह रही की उन्होने अपने खिलाफ किसी भी पहलवान को एक पॉइंट तक नहीं लेने दिया

उसके बाद इसी वर्ष 2021 में कज़ाकिस्तान अल्माटी में आयोजित हुई एसीएन चैंपियनशिप में भी जबरदस्त खेल का पर्दर्सन करते हुए गोल्ड जीता |

और अब ओलिंपिक में क्या कमाल किया अपने देख ही लिया सेमीफइनल तक के मुकाबले देख आप अंदाजा लगा सकते हो पहलवान के हौसले कितने बुलंद है कितनी मेहनत करके गया था ओलिंपिक में और उसका फल मिला सिल्वर मैडल के रूप में |

दोस्तों इस मुकाम तक पहुंचने में इनके साथ बहुत से लोगो का हाथ है सबसे पहले उनके माता पिता का जिन्होंने एक मध्यम किसान परिवार से होकर भी रवि दहिया को ओलम्पियन पहलवान बनाया घर में चाहे किस तरह के हालात रहे हो पर रवि दहिया को कभी खाने पिने में कमी नहीं आने दी उसके पिता रोहज 30 से 35 किलोमीटर का सफर तह कर उसके पास दिल्ली जाया करते थे उसको खाने पिने का सामान दूध, दही, घी देने के लिए ताकि पहलवान को बहार खाने में कोई दिक्कत न हो और उसकी डाइट कम ना पड़े और बेटे ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी जी जान लगा दी एक एक दिन तप करते हुए ओलिंपिक तक पहुंचे और कितनी गर्व की बात है पिता की मेहनत का फल बेटे ने ओलम्पिक में सिल्वर मैडल के रूप में दिया |

उसका दूसरा श्रेय जाता इनके गुरुको जो की सबसे पहले है इनके गांव के पहलवान हंशराज दहिया फिर महाबली सतपाल पहलवान जी, वीरेंदर पहलवान, अनिल मान , प्रवीन दहिया ,अजित मान और उनके सीनियर पहलवान अरुण पंडित जो की इस जर्नी के मैन हीरो है

इनके आलावा रवि दहिया योगेश्वर पहलवान और सुशील कुमार को अपना गुरु मानते है वो बताते है की जिस कमरे में पहले योगेश्वर रहते थे वो कमरा अब उन्होंने लेलिया है वहाँ रहकर उनको ओलिंपिक में मैडल जितने की प्रेरणा मिलती है

तो दोस्तों ये था ओलिंपिक मेडलिस्ट रवि दहिया की ज़िन्दगी का अब तक का सफर इस ओलिंपिक मेडलिस्ट पहलवान की ज़िन्दगी से हमें ये सिखने को मिलता है की हालत कैसे भी हो अगर कुछ करना है तो हौसले बुलंद होने चाहिए और अपनी मेहनत पर विश्वास रखना चाहिए

वो डायलॉग तो अपने सुना ही होगा अगर हम किसी चीज को दिल चाहते है तो पूरी कायनात हमे उनसे मिलाने में लग जाती है |

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